ऋषि महाजन/नूरपुर। चार साल तक बंद पड़ी रेल सेवा को दोबारा शुरू कराने का श्रेय लेने के लिए 2 जून को भाजपा के सांसदों और विधायकों ने मंचों से खूब वाहवाही बटोरी थी।
हरी झंडी दिखाकर इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बताया गया, विपक्ष पर निशाने साधे गए और जनता को संदेश दिया गया कि क्षेत्र की वर्षों पुरानी मांग पूरी कर दी गई है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस रेल सेवा का राजनीतिक उत्सव मनाया गया, उसी पर महज आठ दिन बाद ब्रेक लग गया।
अब स्थिति यह है कि बैजनाथ-पठानकोट रेलखंड पर केवल सुबह और देर शाम दो जोड़ी ट्रेनें ही चलेंगी, जबकि दिन के समय चलने वाली एक जोड़ी ट्रेन को बंद कर दिया गया है। इससे यात्रियों, व्यापारियों, विद्यार्थियों और कर्मचारियों को सीधा नुकसान झेलना पड़ेगा।
जानकारी के अनुसार बैजनाथ पपरोला-नूरपुर रोड रेलखंड पर संचालित ट्रेन संख्या 52471 और 52462 का संचालन 10 जून से बंद कर दिया गया है। रेलवे द्वारा मेंटेनेंस का हवाला दिया जा रहा है, वहीं विभागीय जानकारी अनुसार सप्ताह के हर शुक्रवार कोई भी ट्रेन नहीं चलेगी। लेकिन इस फैसले ने जनता के बीच कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब रेल सेवा चार वर्षों तक बंद रही और पुल निर्माण कार्य पूरा होने के बाद भी करीब छह महीने तक ट्रेनें नहीं चलाई गईं, तब रेलवे ने आवश्यक मेंटेनेंस क्यों नहीं की? यदि ट्रैक, इंजन और अन्य व्यवस्थाओं के रखरखाव की जरूरत थी तो उसका काम संचालन शुरू करने से पहले क्यों नहीं किया गया?
रेलवे संघर्ष समिति के अध्यक्ष पीसी विश्वकर्मा तथा स्थानीय व्यापारी रमेश, रघु, पवन और राजीव का कहना है कि ट्रेन शुरू होने पर नेताओं ने इसे अपनी उपलब्धि बताकर प्रचारित किया, लेकिन अब सेवा प्रभावित होने पर कोई जवाब देने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि रेलवे द्वारा दिया जा रहा मेंटेनेंस का तर्क लोगों के गले नहीं उतर रहा।
रेलवे के फैसले से उन यात्रियों को भी परेशानी उठानी पड़ी जो ट्रेन सेवा शुरू होने की सूचना मिलने के बाद यात्रा की योजना बनाकर पहुंचे थे। पंजाब के बटाला और पठानकोट क्षेत्र से आए यात्रियों प्रियंका और अमन ने बताया कि उन्हें कुछ दिन पहले ही पता चला था कि ट्रेन सेवा बहाल हो गई है। इसके चलते उन्होंने माता कांगड़ा देवी के दर्शन का कार्यक्रम बनाया, लेकिन जसूर (नूरपुर रोड) रेलवे स्टेशन पहुंचने पर पता चला कि ट्रेन बंद हो चुकी है। इससे उन्हें भीषण गर्मी में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
क्षेत्र में यह चर्चा भी जोरों पर है कि आखिर चार साल के लंबे अंतराल में रेलवे ट्रैक, पुलों और अन्य ढांचागत व्यवस्थाओं की समुचित देखरेख क्यों नहीं की गई। कुछ लोगों ने यह आशंका भी जताई कि कहीं सस्ती रेल सेवा और निजी परिवहन हितों के बीच टकराव तो नहीं है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन सवाल लगातार उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब ट्रेन शुरू हुई तो श्रेय लेने के लिए नेताओं में होड़ लगी हुई थी। अब जब सेवा बाधित हुई है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। जनता रेलवे प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से स्पष्ट जवाब चाहती है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि हरी झंडी दिखाने के एक सप्ताह बाद ही ट्रेन को पटरी से उतारना पड़ गया।
जब इस संबंध में रेलवे के डीआरएम विवेक कुमार से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उन्होंने फोन नहीं उठाया।
चार साल तक रेल सेवा बंद रहने के दौरान मेंटेनेंस क्यों नहीं हुई?
पुल बनने के छह महीने बाद तक ट्रेनें क्यों नहीं चलाई गईं?
उद्घाटन और प्रचार के आठ दिन बाद ही ट्रेन बंद करने की नौबत क्यों आई?
श्रेय लेने वाले जनप्रतिनिधि अब चुप क्यों हैं?
क्या जनता की सुविधा से ज्यादा राजनीति को प्राथमिकता दी गई?
रेल सेवा में आए इस व्यवधान ने एक बार फिर उस बहस को जन्म दे दिया है कि क्या जनता की सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ जवाबदेही से बड़ी हो चुकी है।