ऋषि महाजन/नूरपुर। जिस स्कूल में पढ़कर और खेलकूद कर बड़ी-बड़ी हस्तियों ने उच्च पदों पहुंचकर नूरपुर सहित पूरे हिमाचल प्रदेश का नाम रोशन किया, उस स्कूल का सफर 156 साल बाद खत्म होने जा रहा है। हम बात कर रहे हैं ब्वॉय स्कूल नूरपुर की। ब्वॉय स्कूल नूरपुर को पीएम श्री बख्शी टेक चंद राजकीय मॉडल गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल नूरपुर में मर्ज किया गया है। इसको लेकर नोटिफिकेशन भी जारी कर दी गई है।
जिस साल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म हुआ था उसी वर्ष ब्वॉय स्कूल नूरपुर का सफर शुरू हुआ था। 1869 में एमबी सेकेंडरी स्कूल के रूप में इसकी शुरुआत हुई थी। गुलाम भारत में स्कूल का सफर शुरू हुआ और 1892 में एमबी एंगलो वर्नाक्यूलर मिडल स्कूल बना।
डीएवी (एवीएल प्राइमरी स्कूल) 1913 में हुआ। इसके बाद 1928 में डीबी हाई स्कूल के नाम से जाना जाने लगा। आजादी के बाद 1962 में राजकीय हाई स्कूल दर्जा मिला। 1964 में राजकीय हायर सेकेंडरी स्कूल बनने के बाद 1986 में राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल बना।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के तीसरे मुख्य न्यायाधीश मेहर चंद महाजन, एयर चीफ मार्शल एस चांद, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, पूर्व मंत्री और सांसद सत महाजन, संविधान सभा के सदस्य बख्शी टेक चंद, पूर्व मंत्री केवल सिंह पठानिया व पूर्व विधायक रंजीत बक्शी को कौन नहीं जानता है।
मेहर चंद महाजन ने ब्वॉय स्कूल नूरपुर से शिक्षा ग्रहण करके भारत का सर्वोच्च पद प्राप्त किया और एस चांद एयर चीफ मार्शल बने। वहीं, सत महाजन, केवल सिंह पठानिया और रंजीत बख्शी ने इसी स्कूल से पढ़कर राजनीति में नाम कमाया। साथ ही बख्शी टेक चंद भी इसी स्कूल से पढ़कर पड़ी उपलब्धि तक पहुंचे। इन नामों के अलावा भी कई ऐसे नाम है, जिन्होंने ब्वॉय स्कूल नूरपुर से शिक्षा ग्रहण करके विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम लहराया।
ब्वॉय स्कूल नूरपुर अपने आप में ऐतिहासिक है। क्योंकि बड़े-बड़े दिग्गजों की शिक्षा स्थली के साथ यह ऐतिहासिक किले के भीतर स्थित है। यही कारण है कि यह इस अनूठी पहचान के लिए जाना जाता है। एक समय यहां 2000 से अधिक विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे।
नूरपुर ही नहीं, आसपास के विधानसभा क्षेत्रों और पंजाब से भी छात्र यहां पढ़ने आते थे। हालांकि, समय के साथ गांव-गांव स्कूल खुलने और छात्र संख्या में कमी आने लगी। पुरातत्व विभाग के नियमों के कारण जर्जर भवनों का पुनर्निर्माण भी संभव नहीं हो सका, जिससे विद्यालय की भौतिक स्थिति कमजोर होती गई। अब नूरपुर का ये सीनियर सेकेंडरी स्कूल आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहा है।
156 वर्ष की गौरवशाली परंपरा को समेटे यह शिक्षण संस्थान अब विलय की कगार पर खड़ा है। यह केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि नूरपुर की पहचान, इतिहास और भावनाओं से जुड़ा विषय बन चुका है।