मंडी। अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव मंडी के दौरान आने वाले जनपद के लोक देवताओं के रथों की बनावट अलग है तो उसी तरह ही देवताओं के साथ चलने वाले बजंतरियों के वाद्य यंत्रों से निकलने वाली ध्वनियां भी अलग-अलग हैं। वाद्य यंत्रों की धुन से ही इस बात का पता चल जाता है कि देवता किस क्षेत्र से संबंधित है।
जैसे सराज, उत्तर साल और चौहरघाटी के देवताओं के वाद्य यंत्रों की ध्वनियों में विविधता के बावजूद कुछ हद तक समानता भी है। इसमें लोक नृत्य के दौरान बजाई जाने वाली लोक धुनों का समावेश बजंतरियों द्वारा किया जाता है जबकि इसके विपरीत बल्ह घाटी के देवी-देवताओं के साथ बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों की लय में जोश और एकरूपता झलकती है। इसमें बजंतरी एक ही लय पर देर तक बजाते हैं। वहीं पर जनपद के बड़ादेव कमरुनाग जी के वाद्ययंत्रों की धुन सबसे अलग है, जिनके आने पर कोई दूर से ही सुनकर बता सकता है कि बड़ादेव कमरुनाग जी का आगमन हो रहा है।
वाद्य यंत्रों के बजने का भी एक खास क्रम होता है। वहीं पर क्षेत्र विशेष में अलग-अलग धुनें बजाई जाती है। मंडी जिला की बल्ह घाटी के देवी-देवताओं के वाद्य यंत्रों की धुन में जोश भरा नाद होता है। तो सराज, सनोर-बदार चौहार घाटी के देव वाद्यों की धुनों में संगीत की लय और नृत्य की थिरकन सी होती है... जिसकी धुन पर देवलु और देवता झूमते नाचते हैं।
बल्हघाटी के देवी देवताओं को छोड़ कर अन्य घाटियों के देवी-देवता ढोल-नगाड़ों को धुन पर झूमते हैं। यह देवी देवताओं के लोक जीवन पर गहरे प्रभाव का असर है। जिससे पता चलता है कि पहाड़ के वासियों के लिए देवता किसी दूसरे लोक का वासी नहीं है। वह तो लोगों के बीच गांव में रहता है...झूमता -नाचता और रूठता-मानता भी है। देव वाद्यों में देवध्वनि के रूप में सबसे पहले बाम जो एक विशाल ड्रम की तरह होता है, बजाई जाती है।
इसके बाद शहनाई करनाल और रणसिंगा के साथ-साथ ढोल-नगाड़ों के समवेत स्वर उभरते हैं...तब जाकर यह एक देव ध्वनि के रूप में उभरते हैं। हर क्षेत्र के देव वाद्यों की धुन, लय व ताल अलग-अलग होते हैं। जो समय एवं काल अनुसार अलग-अलग ताल में बजाई जाती है। इससे यह भी पता चलता है कि कौन से क्षेत्र में देवता की धुन बज रही तो देवता के मंदिर या भंडार में इस समय कौन सा देवकारज संपन्न हो रहा है।
देव परम्परा में बजंतरियों का महत्वपूर्ण स्थान है। देवता बजतंरियों के बिना एक कदम भी नहीं चलते हैं। वाद्य यंत्रों की लोकधुनों पर जहां देवलू नाचते हैं तो देवता भी झूमने लगते हैं। देवताओं के रुठने मानने देव खेल, यात्रा पर निकलने, पड़ाव पर पहुंचने और भंडारने आदि के अलग-अलग संकेत देव ध्वनियों के माध्यम से ही किये जाते हैं। देवता और बजंतरी का रिश्ता अटूट है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। देवता है तो बजंतरी भी है। देव परम्परा के अनुसार देवता का कोई भी कारज वाद्य यंत्रों की धुन के बिना पूरा नहीं होता है।
देवी-देवताओं के साथ बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों को देव वाद्य कहा जाता हे। जिनमें ढोल, नगाड़े के अलावा करनाल, रणसिंगा, काहल, फड़ी और षहनाई प्रमुख हैं। इनमें ढोल-नगाड़े के खोल पितल से बनते हैं। जिनमें नगाड़े पर भैंस का मोटा चमड़ा, तो ढोल पर बकरे की खाल लगाई जाती है, जबकि करनाल चांदी, पितल तथा रणसिंगा चांदी और तांबे से बनाए जाते हैं। वहीं षहनाई अक्सर लकड़ी की बनी होती हैै, मगर उस पर चांदी की परत भी चढ़ाई जाती है।
शिवरात्रि महोत्सव में आने वाले समस्त देवी देवताओं के बजंतरीगण उत्सव के दौरान वाद्ययंत्र वादन की कला का प्रदर्षन करते हैं। जिला भाषा अधिकारी कार्यालय द्वारा प्रधान सर्व देवता कमेटी व अन्य सदस्यों के सहयोग से वाद्य यंत्र प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। यह प्रतियोगिता जलेब निकलने वाले दिनों के अलावा हर रोज प्रातः 11 बजे से सायं 5 बजे तक पड्डल मैदान में वल्लभ महाविद्यालय मंडी मंच के सामने आयोजित की जाती है। मेले में आये लोग, देवलु, श्रद्धालु एवं पर्यटक इस प्रतियोगिता के प्रत्यक्षदर्शी बनते हैं ।
इस प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय, तृतीय स्थान हासिल करने वाले बजंतरियों को मेले के अंतिम दिन समापन समारोह में माननीय राज्यपाल महोदय द्वारा पुरस्कार राशि व प्रमाण पत्र प्रदान किए जाते हैं। इस प्रतियोगिता का उद्देश्य वाद्य यंत्र वादन कला को जीवंत रखना और बजंतरियों को प्रोत्साहित करना है।
वाद्य यंत्र वादन देव परम्परा एवं लोक परम्परा है, इसे संरक्षण देने तथा इसके प्रचार-प्रसार के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। बजंतरियों को शिवरात्रि महोत्सव में नजराना देकर सम्मानित तथा प्रोत्साहित किया जाता है।