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चिड़नू संक्रांति : पशुधन की सुरक्षा और समृद्ध ग्रामीण संस्कृति का अनूठा उत्सव

ewn24 news choice of himachal 16 Jul,2026 1:36 pm



    कांगड़ा। सावन संक्रांति के पावन अवसर पर देवभूमि हिमाचल प्रदेश के निचले इलाकों—विशेषकर हमीरपुर, कांगड़ा, मंडी और बिलासपुर—में पारंपरिक त्योहार 'चिड़नू' (या छिडनु) बड़े ही हर्षोल्लास और पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार ग्रामीण संस्कृति, कृषि और मवेशियों (पशुधन) की सुरक्षा से गहराई से जुड़ा हुआ है।

    यह त्योहार भादों (भाद्रपद) महीने की संक्रांति (सिंह संक्रांति) को मनाया जाता है, जो आमतौर पर अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 16-17 जुलाई को आती है। इस समय बरसात का मौसम अपने चरम पर होता है।

    कैसे मनाई जाती है यह संक्रांति, जानें पारंपरिक रस्में


    कांटे चुभाने की रस्म: इस दिन घर के आंगन या गोशाला (औहड़) में एक स्थानीय फल जैसे ककड़ी (खरा), गलगल (नींबू प्रजाति का फल) या अरबी के पत्तों को लिया जाता है। इसके बाद, एक कँटीली झाड़ी (जिसे स्थानीय भाषा में बन्ना या बेहकर कहा जाता है) के कांटों को इस फल में चुभाया जाता है।

    मंत्र या लोक-गीत बोलना: कांटे चुभाते समय घर के बड़े-बुजुर्ग एक पारंपरिक पहाड़ी पंक्ति बोलते हैं:

    "चीडनू नासे, लीख नासे, रोग नासे... डांगरे राजी रहन, माल-मवेशी राजी रहे!"

    (अर्थात: सभी कीड़े-मकौड़े, जूं और बीमारियां घर-बार छोड़कर दूर भाग जाएं और हमारे पशु व परिवार हमेशा स्वस्थ रहें।)

    फेंकना: इस रस्म के बाद, कांटे चुभे हुए उस फल को घर की सीमा से बाहर या किसी चौराहे पर फेंक दिया जाता है, जो यह दर्शाता है कि घर की सारी बीमारियां और नकारात्मकता बाहर चली गई हैं।

    पशुधन की सुरक्षा और 'पिथड़ दहन' की अनूठी परंपरा


    इस त्योहार का सबसे मुख्य और अनूठा पहलू मवेशियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा है। चिड़नू के दिन सभी पशुपालक सुबह से ही अपने गाय-भैंसों की विशेष देखभाल में जुट जाते हैं। इस दिन पशुओं के शरीर और कानों से हानिकारक परजीवियों व कीटों (जिन्हें स्थानीय भाषा में पिथड़, चिचड़ी या खटमल कहा जाता है) को निकाला जाता है।

    रात के समय पूरे गांव के लोग एक जगह इकट्ठा होते हैं और इन एकत्रित किए गए कीटों को गोबर के साथ पवित्र आग (अलाव) में जलाते हैं, जिसे 'पिथड़ दहन' कहा जाता है। ग्रामीण इस दौरान अपने मवेशियों की साल भर रोगों से रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं।




    लोकगीतों की तान और उत्सव का माहौल


    अलाव जलाने के बाद गांव का माहौल पूरी तरह से उत्सवमय हो जाता है। ग्रामीण रात देर तक आग के चारों ओर इकट्ठा होकर पारंपरिक लोकगीत (जैसे राग मल्हार) गाते हैं और खुशी से झूमते-नाचते हैं। बच्चों में इस त्योहार को लेकर विशेष उत्साह देखा जाता है, जो पूरी मस्ती के साथ इस पवित्र आग के ऊपर से छलांग लगाते हैं।

    मायके आने की परंपरा और पारंपरिक पकवानों का स्वाद


    चिड़नू त्योहार का एक बेहद खूबसूरत सामाजिक पहलू भी है। पुराने समय से ही इस विशेष अवसर पर विवाहित बेटियों के अपने मायके आने की एक समृद्ध परंपरा रही है, जहाँ परिवार के सदस्य उनका बेसब्री से इंतजार करते हैं।

    इस दिन हिमाचली रसोईयों में पारंपरिक पकवानों की खुशबू महकती है। घरों में विशेष रूप से हलवा, पूरी, बबरू (तली हुई मीठी रोटियां), पतरोड़ू और आलू की सब्जी बनाई जाती है। इन लजीज पकवानों को पहले भगवान और मवेशियों को अर्पित किया जाता है और फिर आपस में बांटकर खाया जाता है।

    आधुनिकता के बीच सांस्कृतिक विरासत को बचाने की चिंता


    जहाँ एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बुजुर्ग महिलाएं और पशुपालक इस अनूठी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं, वहीं बदलते समय और आधुनिकता के प्रभाव के कारण यह समृद्ध सांस्कृतिक विरासत शहरों में धीरे-धीरे लुप्त होने के कगार पर पहुंच रही है। बुद्धिजीवियों और संस्कृति प्रेमियों का मानना है कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने के लिए ऐसे पारंपरिक त्योहारों का संरक्षण बेहद जरूरी है।

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