अंकित चौधरी, सूरज प्रकाश डिंपू/हरिपुर। हिमाचल प्रदेश के देवभूमि कांगड़ा में कई ऐसे धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं, जो सदियों से अटूट आस्था का केंद्र रहे हैं।
ऐसा ही एक पावन इतिहास जुड़ा है जगती जोत बाबा बाजी साहिब पंज बड़ वाले जी से। बाबा बाजी साहिब जी का जीवन और उनकी तपोस्थली आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखती है।
इतिहास के अनुसार, बाबा बाजी साहिब जी सिख धर्म के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी के वंशज थे। उनका जन्म पंजाब के नवांशहर में हुआ था। वैराग्य और तपस्या की राह पर चलते हुए वह बाद में कांगड़ा जिला के देहरा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले भटोली फकोरियां (पंज बड़) पहुंचे।
यहां की शांत वादियों में उन्होंने कठिन तपस्या की। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पंज बड़ में तत्कालीन राजा ने उनकी आध्यात्मिक ख्याति से प्रभावित होकर उन्हें भूमि दान में दी थी, जहां अंततः बाबा जी ने समाधि ली।
समय बदला और पौंग डैम (Pong Dam) का निर्माण हुआ, जिसके कारण पंज बड़ का वह ऐतिहासिक स्थान पानी में डूब गया।
इसके बाद, बाबा जी के प्रति अगाध श्रद्धा को देखते हुए उनकी अस्थियों और अन्य पवित्र अवशेषों को वहां से सुरक्षित निकाला गया। इन अवशेषों को बंगोली पंचायत के रोड़ डिब्बर लाया गया, जहां आज भी बाबा जी की पवित्र समाधि स्थापित है और रोजाना श्रद्धालु यहां शीश नवाने आते हैं।
पुराने मंदिर के केयरटेकर सुशील कुमार उर्फ काका ने बाबा जी के जीवन से जुड़ा एक बेहद रोचक और अनसुना किस्सा साझा किया। बाबा बाजी साहिब का असली नाम राजा राम था।
जब भी कोई बच्चा, बड़ा या बुजुर्ग पंज बड़ में उनके गुरु स्थान के पास से गुजरता था, तो बाबा जी उन्हें भेंट स्वरूप खाने की कोई न कोई चीज (प्रसाद) जरूर देते थे।
जब बच्चों से घर जाकर पूछा जाता था कि यह खाने की चीज किसने दी, तो बच्चे बड़ी मासूमियत से जवाब देते थे कि "पंज बड़ वाले बाबा ने बाजी (भेंट/सौगात) दी है। बच्चों के मुंह से निकले इसी शब्द के बाद से उनका नाम हमेशा के लिए 'बाबा बाजी' पड़ गया।