ऋषि महाजन/नूरपुर। अंग्रेजी हुकूमत के समय बना कांगड़ा घाटी रेल ट्रैक वर्तमान में अस्तित्व की जंग लड़ रहा है। ट्रैक अपग्रेड होना तो दूर वर्षों से जो सुविधाएं मिल रही थीं, वे भी अभी बंद पड़ी हैं। 3 साल के अधिक समय से ट्रैक पर पठानकोट से ट्रेनों की आवाजाही बंद है।
वहीं, लोगों को अब एक नई परेशानी से दो चार होना पड़ रहा है। वर्ष 1932 में अंग्रेजी शासनकाल के दौरान जब कांगड़ा घाटी रेल ट्रैक का निर्माण हुआ था, तब रेल लाइन के आर-पार बसे गांवों के लिए 16 रेल फाटक और 24 कैटल क्रॉसिंग की सुविधा दी गई थी, ताकि ग्रामीणों की आवाजाही और पशुधन का आवागमन बाधित न हो।
पहले रेलवे ने सभी 16 फाटकों से कर्मचारियों को हटा दिया और अब रेलवे प्रशासन 24 कैटल क्रॉसिंग रास्तों को भी एक-एक कर बंद कर रहा है। कई स्थानों पर इन रास्तों को लोहे के मोटे गार्डर लगाकर पूरी तरह सील कर दिया गया है।
ग्रामीणों के लिए ये कैटल क्रॉसिंग सिर्फ रास्ते नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरत थीं। इन्हीं रास्तों से लोग अपने पशुधन, दोपहिया वाहन और पैदल रेल ट्रैक के आर-पार आते-जाते थे। रास्ते बंद होने से छतरोली सहित आसपास के कई गांवों के लोगों को अब कई किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है।
स्थानीय निवासी सुरम सिंह, बलदेव, कमल, मुकेश और संजय सहित अन्य ग्रामीणों का कहना है कि छतरोली रेलवे फाटक पशु 19/23 जसूर के पास बना हुआ है और 70-80 लोगों के घर रेलवे लाइन के आर-पार पड़ते हैं और लोगों को आने-जाने का यही एकमात्र रास्ता है।
यह रास्ता राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार राष्ट्रीय उच्च मार्ग नंबर 20 का खसरा और आम रास्ते का खसरा नंबर 1017 चौड़ाई 5.5 मीटर है। यह रास्ता पूरे गांव कि को जोड़ता है।
जहां रेलवे आज नई-नई सुविधाओं के नाम पर करोड़ों खर्च कर रही है, वहीं वह उन बुनियादी सुविधाओं को छीन रही है, जो अंग्रेजों के शासन में भी ग्रामीणों को मिली हुई थीं। ग्रामीणों का आरोप है कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के रास्ते बंद करना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।
मामले को लेकर छतरोली व अन्य गांवों के प्रतिनिधियों ने कांगड़ा-चंबा लोकसभा सांसद डॉ. राजीव भारद्वाज से मुलाकात कर समस्या उनके समक्ष रखी।
इस मामले को लेकर सांसद डॉ. भारद्वाज ने कहा कि यह मामला उनके ध्यान में लाया गया है। उन्होंने रेलवे के संबंधित अधिकारियों से बात की है और स्पष्ट कहा है कि ग्रामीणों को इस समस्या से राहत दी जाए तथा वर्षों पुरानी इस सुविधा को छीना न जाए।
ग्रामीणों को अब उम्मीद है कि सांसद के हस्तक्षेप के बाद रेलवे प्रशासन कोई ठोस समाधान निकालेगा, ताकि कांगड़ा घाटी के गांवों की वर्षों पुरानी जीवनरेखा फिर से बहाल हो सके।
वहीं, नॉर्दर्न रेलवे जोन की ZRUCC (Zonal Railway Users’ Consultative Committee) के सदस्य दीपक भारद्वाज ने कहा कि इस बाबत जीएम रेलवे और चेयरमैन को पत्र लिखा गया है, ताकि लोगों की समस्या का निवारण हो और लोगों को दोबारा सुविधा मिले।