भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व 'कृष्ण जन्माष्टमी' हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष जन्माष्टमी का त्योहार 4 सितंबर 2026 (शुक्रवार) को मनाया जाएगा। आइए आपको बताते हैं जन्माष्टमी की तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत के नियम एवं संकल्प के साथ पूजा विधि ....
अष्टमी तिथि की शुरुआत: 4 सितंबर 2026 को रात 02:25 बजे से
अष्टमी तिथि का समापन: 5 सितंबर 2026 को रात 12:13 बजे तक
निशिता पूजा (मध्यरात्रि पूजा) का समय: 4 सितंबर की रात 11:13 बजे से रात 11:59 बजे तक
कृष्ण जन्म का मुख्य क्षण: रात 11:36 बजे
जन्माष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो पीले या लाल) धारण करें।
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प लें:
"मैं श्रीकृष्ण की प्रसन्नता और कृपा प्राप्ति के लिए जन्माष्टमी का निर्जला/फलाहारी व्रत रखने का संकल्प लेता/लेती हूँ।"
दिनभर सात्विक रहें। फलाहार (दूध, फल, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा) ले सकते हैं। मन में "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" या "हरे कृष्णा" महामंत्र का जाप करते रहें।
अभिषेक सामग्री: पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) और गंगाजल।
शृंगार सामग्री: लड्डू गोपाल की मूर्ति, वस्त्र, मुकुट, मोरपंख, बांसुरी, वैजयंती माला, चंदन, रोली, अक्षत।
भोग सामग्री: ताजा माखन, मिश्री, धनिया की पंजीरी, पंचमेवा, चरणामृत और तुलसी पत्र (बिना तुलसी के भोग स्वीकार नहीं होता)।
अन्य: झूला, दीपक, धूप, आरती की थाली, फूल।
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रात 12:00 बजे माना जाता है। सही क्रम से पूजा करने के लिए नीचे दी गई प्रक्रिया का पालन करें:
सफाई एवं वेदी स्थापना: रात 11:30 बजे से तैयारी शुरू करें.
पूजा स्थान को स्वच्छ करके लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर चौक पूरकर लड्डू गोपाल के लिए सुंदर झूला सजाएं।
भगवान का प्रकटोत्सव (जन्म): रात 12:00 बजे
शंख बजाकर और घंटी ध्वनि के साथ बाल गोपाल का जन्म कराएं (कई लोग खीरे को काटकर उसमें से बाल गोपाल का जन्म सांकेतिक रूप से कराते हैं)।
पंचामृत स्नान एवं अभिषेक: लड्डू गोपाल को एक पात्र में रखकर पहले गंगाजल से, फिर पंचामृत से और अंत में पुनः शुद्ध गंगाजल से स्नान कराएं।
शृंगार एवं झूला झुलाना: भगवान को पोंछकर नए वस्त्र पहनाएं। चंदन का तिलक लगाएं, मुकुट, मोरपंख, बांसुरी और माला पहनाएं। इसके बाद भगवान को झूले में विराजमान करके झूला झुलाएं।
भोग एवं आरती: माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, फल और मिठाइयों पर तुलसी पत्र रखकर बाल गोपाल को समर्पित करें। धूप-दीप जलाकर श्रीकृष्ण की आरती गाएं।
पारण का समय: मध्यरात्रि पूजा और महाप्रसाद वितरण के बाद या अगले दिन सूर्योदय के बाद तिथि समाप्त होने पर व्रत खोला जाता है।
पारण सामग्री: सबसे पहले चरणामृत, माखन-मिश्री और धनिया पंजीरी का प्रसाद ग्रहण करके अपना व्रत खोलें।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में मथुरा नगरी पर अत्याचारी राजा कंस का शासन था। कंस अपनी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था, लेकिन जब वह देवकी और उनके पति वसुदेव को विवाह के बाद विदा कर रहा था, तब एक आकाशवाणी हुई— "हे कंस! जिस बहन को तुम इतने प्रेम से विदा कर रहे हो, उसी की आठवीं संतान तुम्हारा वध करेगी।"
आकाशवाणी सुनते ही कंस भयभीत हो गया और उसने अपनी बहन देवकी तथा वसुदेव को कारागार में बंदी बना लिया। मृत्यु के डर से कंस ने देवकी के एक-एक करके छह नवजात शिशुओं को मार डाला। सातवें गर्भ के रूप में शेषनाग के अवतार बलरामजी पधारे, जिन्हें भगवान विष्णु की योगमाया द्वारा गोकुल में वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया।
भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में स्वयं श्री कृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया।
श्री कृष्ण के जन्म लेते ही कारागार में अलौकिक प्रकाश फैल गया, सभी प्रहरी गहरी नींद में सो गए और कारागार के भारी द्वार तथा बेड़ियां अपने आप खुल गईं। देववाणी के अनुसार वसुदेवजी नवजात शिशु कृष्ण को सूप में रखकर उफनती यमुना नदी पार कर गोकुल में नंदबाबा और माता यशोदा के घर सुरक्षित पहुंचा आए। वहीं, यशोदा के घर जन्मी योगमाया रूपी कन्या को वसुदेव मथुरा ले आए।
जब कंस ने उस कन्या को मारने का प्रयास किया, तो वह कन्या आकाश में ओझल होकर देवी रूप में प्रकट हुई और बोली— "हे मूर्ख कंस! तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है और वह सुरक्षित स्थान पर पहुंच गया है।"
आगे चलकर श्री कृष्ण ने गोकुल में विभिन्न बाल लीलाएं कीं और अंततः कंस का वध कर पृथ्वी को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया और धर्म की स्थापना की।