हिमाचल प्रदेश में छठी कक्षा से सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम अनिवार्य किए जाने के बाद हिंदी भाषा की स्थिति ऐसी हो गई है कि वह मानो सहानुभूति के लिए बंद दरवाजे से बाहर झांक रही हो।
सरकारी और निजी दोनों स्कूलों में बच्चों को अंग्रेजी में पढ़ाई करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जबकि मातृभाषा हिंदी धीरे-धीरे पीछे हट रही है शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठते ही सबसे पहले ठीकरा हिंदी भाषा पर फोड़ दिया जाता है। लेकिन क्या कभी भाषा से हटकर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में कोई ठोस और क्रांतिकारी सुधार करने का प्रयास किया गया है, इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता।
शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य भाषा बदलना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिए जिसमें बच्चे सहज रूप से ज्ञान प्राप्त कर सकें और उनका सर्वांगीण विकास हो। आज एक होड़ सी लग गई है कि बच्चे को अंग्रेजी भाषा कितनी आती है, उसी से उसके ज्ञान का आकलन किया जाने लगा है। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
दुनिया की हर भाषा सीखना अच्छी बात है, पर क्या अपनी ही भाषा को दरकिनार कर देना उचित है? रूस, चीन, जर्मनी और जापान जैसे देश शिक्षा के क्षेत्र में हमसे आगे माने जाते हैं, लेकिन वहां शिक्षा पूरी तरह अंग्रेजी माध्यम पर निर्भर नहीं है, बल्कि मातृभाषा को ही प्राथमिकता दी जाती है।
प्रदेश में अधिकांश बड़े निजी स्कूल अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दे रहे हैं और बड़े अधिकारियों, नेताओं व मंत्रियों के बच्चे भी इन्हीं स्कूलों में पढ़ते हैं। शायद यही वजह है कि अंग्रेजी के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा है और हिंदी जैसी मातृभाषा धीरे-धीरे पीछे धकेली जा रही है। हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी पहचान और संस्कृति का आधार है। अगर शिक्षा से ही हिंदी को दूर कर दिया गया तो आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से कटती चली जाएगी। स्कूलों में अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ हिंदी को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
नई शिक्षा नीति 2020 में दिए गए भाषा मॉडल को प्रभावी रूप से लागू किया जाए, ताकि बच्चों को मातृभाषा में सीखने का अवसर मिल सके और शिक्षा का स्तर भी बेहतर हो। 14 सितंबर को बड़े-बड़े भाषणों में हिंदी के सम्मान में तालियां बजाने से कुछ नहीं होगा, यदि हम अपनी ही शिक्षा व्यवस्था में मातृभाषा को सम्मान नहीं दे सके।
हिंदी को बचाने के लिए केवल भावनाएं नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने की जरूरत है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे मातृभाषा में आसानी से समझ पाते हैं जिससे उनका बौद्धिक विकास जल्दी होता है जब शिक्षा अपनी भाषा में होती है तो बच्चे ज्ञान को सही अर्थों में समझते हैं। इसलिए जरूरी है कि हिंदी और अंग्रेजी के बीच संतुलन बनाकर शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
अभिषेक कुमार
(स्वतंत्र लेखक), ऊना