नई दिल्ली। सफलता की सबसे खूबसूरत घड़ी वही होती है, जब आप अपनी सबसे बड़ी खुशी उस शख्स के साथ बांट सकें जिसने आपके सपनों के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी न्योछावर कर दी। लेकिन जब 23 साल की अस्मिता डे ने राष्ट्रमंडल खेलों में इतिहास रचते हुए जूडो का स्वर्ण पदक अपने नाम किया, तो यह ख़बर सुनने के लिए उनके सबसे बड़े समर्थक और पिता इस दुनिया में मौजूद नहीं थे।
त्रिपुरा के एक बेहद छोटे और गुमनाम गांव के साधारण मिट्टी के घर से निकलकर खेल जगत के सबसे बड़े मंच तक पहुंचने वाली अस्मिता डे की यह कहानी सिर्फ एक खेल की जीत नहीं, बल्कि अदम्य साहस, पारिवारिक समर्पण और कभी न हार मानने वाले जज़्बे की दास्तान है।
अस्मिता का बचपन अभावों के बीच बीता। उनके पिता एक साइकिल मैकेनिक थे, जो रोज़ाना करीब 300 रुपए की मामूली कमाई से पूरे परिवार का पेट पालते थे। जिस माहौल में लोग बड़े सपने देखने से कतराते हैं, वहां पिता ने अपनी बेटी के जूडो स्टार बनने के सपने को संजोया।
जब घुटने की गंभीर चोट ने अस्मिता के करियर पर विराम लगाने की धमकी दी, तब पिता ही उन्हें इलाज के लिए दिल्ली लाए, दवाइयां जुटाईं और बेटी के खेल के आगे गरीबी को कभी आड़े नहीं आने दिया।
पिछले साल दिसंबर में 'ब्रेन स्ट्रोक' के कारण पिता का अचानक निधन हो गया। अस्मिता के लिए यह किसी वज्रपात जैसा था। उन्हें लगा कि उनके सपनों का अंत हो चुका है, लेकिन इस कठिन मोड़ पर उनकी माँ ने परिवार और सपनों की कमान संभाली। पिता के अंतिम संस्कार के महज़ 10 दिन बाद अस्मिता को ट्रेनिंग पर वापस भेजते हुए उनकी मां ने कहा कि अगर आज मैंने तुम्हें रोक दिया, तो तुम्हारे पिता सोचेंगे कि मैंने तुम्हारे सपनों का गला घोंट दिया।
मां के इन शब्दों ने अस्मिता के भीतर एक नया संकल्प भर दिया और वे सामान समेटकर तुरंत भोपाल स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) केंद्र लौट आईं।
स्वर्ण पदक तक पहुंचने का यह सफर बेहद मानसिक और शारीरिक तनाव से भरा था। राष्ट्रमंडल खेलों से ठीक पहले अस्मिता कई रातों तक सो नहीं सकीं। सुबह 5:30 बजे से अभ्यास: दिमाग में बस एक ही धुन थी—जीत।
उनके लक्ष्य के प्रति समर्पण का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी पसंदीदा मिठाई 'लवंगलता' को खाने से खुद को रोके रखा, जो उनके भाई ने उनके लिए खरीदकर फ्रिज में रखी थी।
शुक्रवार को ग्लास्गो की मैट पर जब अस्मिता ने महिलाओं के 48 किग्रा भार वर्ग में प्रतिद्वंदियों को पछाड़कर पोडियम पर शीर्ष स्थान हासिल किया, तो वे राष्ट्रमंडल खेलों में जूडो में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं।
जीत के बाद अस्मिता बेहद भावुक हो गईं। जश्न की जगमगाहट के बीच उनकी आँखें अपने पिता को ढूंढ रही थीं। यह स्वर्ण पदक सिर्फ एक धातु का टुकड़ा नहीं, बल्कि उस साइकिल मैकेनिक पिता की मेहनत और एक मां के अटूट विश्वास का अमर प्रतीक है।