शिमला। जाखू मंदिर का नाम तो सभी ने सुना ही होगा और यहां का दशहरा भी काफी प्रसिद्ध है। लेकिन यहां का दशहरा मनाने की वजह कुछ खास है जो हम आपको बताते हैं।
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की सबसे ऊंची पहाड़ी जाखू (8,048 फीट) पर स्थित जाखू मंदिर में दशहरा पर्व मनाना केवल एक पारंपरिक आयोजन नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध पौराणिक रामायण काल की एक पवित्र घटना से है।
मान्यता है कि लंका युद्ध के दौरान जब मेघनाद के बाण से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे, तब वैद्य सुषेण की सलाह पर भगवान राम के परम भक्त हनुमान जी संजीवनी बूटी की खोज में द्रोणागिरी पर्वत की ओर उड़े थे। रास्ते में जाखू पहाड़ी पर ध्यानमग्न 'यक्ष' ऋषि को देखकर हनुमान जी जानकारी लेने के लिए यहां उतरे थे।
संजीवनी बूटी लेकर लौटने का वादा कर जब हनुमान जी कालनेमि राक्षस का वध करने में विलंब होने के कारण सीधे लंका चले गए, तो ऋषि की प्रतीक्षा का मान रखते हुए वे बाद में स्वयं यहां प्रकट हुए। यक्ष ऋषि ने इसी स्थान पर हनुमान जी की प्रतिमा और उनके पदचिह्न स्थापित किए थे, जिससे इस स्थान का नाम 'यक्ष' से बदलते-बदलते 'जाखू' पड़ा।
दशहरा बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। क्योंकि जाखू पहाड़ी स्वयं श्री राम और हनुमान जी के दिव्य संवाद तथा रावण-पुत्र मेघनाद के बाण से लक्ष्मण के प्राण बचाने की पौराणिक घटना का मुख्य केंद्र रही है, इसलिए शिमला का यह सर्वोच्च स्थल विजयदशमी मनाने के लिए अत्यंत पावन माना जाता है।
यहाँ 108 फीट ऊँची हनुमान जी की भव्य प्रतिमा विराजमान है, जिसकी छत्रछाया में हर वर्ष जाखू मैदान में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर धूमधाम से विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। जाखू का यह ऐतिहासिक दशहरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि उत्तर भारत में सांप्रदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक धरोहर का एक अनूठा उदाहरण भी पेश करता है।