हरिपुर। मैं हरिपुर हूं। कभी गुलेर रियासत की राजधानी हुआ करता था। दादी और नानी जिस राजा और रानी की बात कहानियों में करते थे, वो यहां रहते थे।
आबाद किले थे, मंदिर व गुफाएं थीं और बावड़ियां व तालाब थे। हरिपुर किला राजा हरि चंद द्वारा बनाया गया था। लेकिन समय के साथ मैं अपना वजूद खोता चला गया।
किले सहित अन्य ऐतिहासिक धरोहरें खड़हर हो गईं। बावड़ियां, कुएं और तालाब अपना अस्तित्व खो चुके। गुफाएं जर्जर हालत में हैं। हरिपुर की इन ऐतिहासिक धरोहरों पर किसी की नजर-ए-इनायत नहीं पड़ी।
इन धरोहरों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा सकता था। कहा जाता है कि हरिपुर के किले के अंदर एक अंडरग्राउंड गुफा थी, जोकि गुलेर पुल के पास बनेर किनारे निकलती थी। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि हरिपुर सरस्वती माता मंदिर के पास से भी उस गुफा के लिए एंट्री थी।
इन गुफा नुमा रास्तों का प्रयोग दुश्मनों के हमले के दौरान सुरक्षा के लिए किया जाता था। भूकंप आदि के कारण किले के ढह जाने के चलते अभी किले के अंदर गुफा का कोई चिन्ह नहीं है, लेकिन सरस्वती माता मंदिर के पास गुफा का द्वार होने के चिन्ह थे। वहीं, गुलेर पुल के पास बनेर किनारे चट्टानों में गुफा के चिन्ह जरूर मिलते हैं।
अगर समय रहते इस पर ध्यान दिया होता तो इसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा सकता था और यह गुफानुमा रास्ते लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकते थे। ऐसे में युवाएं को रोजगार के साथ हरिपुर क्षेत्र की अलग पहचान होती।
वहीं, प्राचीन मंदिरों, तालाब, बावड़ियों और कुओं का भी जीर्णोद्धार कर इन्हें पर्यटन से जोड़ा जा सकता था। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हरिपुर में ऐसा करना नामुमकिन था या फिर अनदेखी के चलते गुलेर रियासत की राजधानी हरिपुर अपना वजूद खो चुकी।