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सिरमौर : गिरिपार में बूढ़ी दिवाली शुरू, धूमधाम से मनाया जा रहा आस्था का पर्व

    सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र में आज भी प्राचीन परंपराओं को बखूबी निभाया जाता है। दीपावली के एक महीने बाद अमावस्या की रात को गिरिपार क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली को पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में बूढ़ी दिवाली को मशराली के नाम से जाना जाता है। बूढ़ी दीपावली का त्योहार गिरिपार और उत्तराखंड के जौनसार में मनाया जाता है।

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    गिरिपार क्षेत्र में एक सप्ताह तक मनाया जाने वाला बूढ़ी दिवाली का त्योहार शुरू हो गया है। एक हफ्ते तक चलने वाले इस त्योहार में सभी ग्रामीण अपने-अपने गांव में एक स्थान पर एकत्रित होकर बूढ़ी दिवाली मनाते हैं। इस दौरान ग्रामीण पारंपरिक लोक नृत्य भी प्रस्तुत करते हैं।

    ऐसी मान्यता है कि गिरिपार के लोगों को आम दिवाली के एक माह बाद जब भगवान राम के 14 वर्ष का वनवास व रावण का वध करने के बाद के अयोध्या वापस लौटने की जानकारी मिली तो उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए देवदार और चीड़ की लकड़ियों की मशाल बनाकर रोशनी की। उन्होंने खूब नाच-गाना भी किया था। इसके बाद से ही गिरिपार क्षेत्र बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा शुरू हो गई।

    कई जगह बूढ़ी दिवाली को राजा बलि या बलिराज से भी जोड़ा जाता है। उनके अनुसार राजा बलि को भगवान विष्णु ने जब पाताल पहुंचाया था तो उनके बीच कुछ समझौता हुआ था। उनको ही समर्पित करते हुए ये मशालें जलाई जाती हैं।  दीपावली से ठीक एक माह बाद मनाए जाने वाले इस त्योहार की गरिमा किसी भी हालत में दिवाली से कम नहीं रहती। गिरिपार के क्षेत्र में तो यही असली दिवाली है। सदियों से चली आ रही बूढ़ी दिवाली की परंपरा को आज भी गिरिपार क्षेत्र के लोग संजोए हुए हैं।
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    आधी रात को कड़कड़ाती ठंड में भी लोग हाथों में मशाल लेकर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर थिरकते-थिरकते पौराणिक लिंबर नृत्य का आनंद उठाते हैं। बच्चे-बूढ़े और महिलाएं व पुरुष सभी आस्था के इस महापर्व में खूब झूमते हैं। सतयुग से चली आ रही इस पौराणिक परंपरा को क्षेत्र के लोग सदियों बाद भी संजोए हुए हैं।

    बूढ़ी दिवाली के त्योहार में लोग परोकड़िया गीत, विरह गीत, भयूरी, रासा, नाटिया व स्वांग के साथ हुड़क डांस करते हैं। कुछ जगहों पर इस बूढ़ी दिवाली पर बढ़ेचू डांस करने की भी परंपरा है। कई जगहों पर रात में बुड़ियात डांस भी किया जाता है। इस दौरान लोग एक दूसरे को सूखे मेवे, चिड़वा, अखरोट व शाकुली खिलाकर बधाई देते हैं। बूढ़ी दिवाली के दौरान अलग-अलग दिन अस्कली, धोरोटी, पटांडे, सीड़ो व तेलपकी आदि पारम्परिक व्यंजन परोसे जाते हैं।

    दीपावली के अगले रोज पोड़ोई, दूज, तीच व चौथ आदि पर ग्रेटर सिरमौर के कईं गांव में सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन किया जाता है जिसमें से कुछ जगहों पर रामायण व महाभारत का मंचन किया जाता है। विशेष समुदाय से संबंध रखने वाले पारंपरिक बुड़ेछू कलाकारों द्वारा इस दौरान होकू, सिंघा वजीर, चाय गीत, नतीराम व जगदेव आदि वीर गाथाओं गायन किया जाता है।

    सदियों से क्षेत्र में केवल दीपावली अथवा बड़ी दिवाली तथा बूढ़ी दिवाली के दौरान ही बुड़ेछू नृत्य होता है। इसे बूढ़ा अथवा बुड़ियाचू नृत्य भी कहा जाता है। स्थानीय लोग बुड़ेछू दल के सदस्यों को नकद बक्शीश के अलावा घी के साथ खाए जाने वाले पारंपरिक व्यंजन भी परोसते हैं। इस परंपरा को ठिल्ला कहा जाता है।
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