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वाटर सेस पर बोले सुक्खू - पड़ोसी राज्यों के जल अधिकार का नहीं हो रहा उल्लंघन

    विद्युत उत्पादन पर जल उपकर लगाना हमारा अधिकार

    शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए जल उपकर अधिनियम-2023 को लेकर बवाल मचा हुआ है। हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट से वाटर सेस वसूले जाने के फैसले की पंजाब और हरियाणा सरकार ने निंदा की है। पंजाब सरकार ने इस संबंध में विधानसभा में निंदा प्रस्ताव भी पास किया है, वहीं हरियाणा सरकार ने भी इस फैसले का विरोध जताया है। हिमाचल विधानसभा बजट सत्र के आठवें दिन
    मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सदन में इस मामले पर स्पष्टीकरण दिया है।

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    मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा हिमाचल प्रदेश अपने पड़ोसी राज्यों को सम्मान देते हुए कहना चाहता है कि प्रदेश में सरकार द्वारा Water Cess on Hydro Power Generation Act 2023 जो लागू किया है वह किसी प्रकार की अन्तरराजीय संधियों का उल्लंघन नहीं करता न ही Indus water treaty के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। पंजाब व हरियाणा द्वारा यह कहना कि हिमाचल सरकार का जल उपकर लगाने का फैसला अन्तरराजीय जल विवाद अधिनियम-1956 (Inter State River dispute Act 1956) के खिलाफ है तर्कसंगत नहीं है क्योंकि इसमें पड़ोसी राज्यों को छोड़े जाने वाले पानी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस अधिनियम का कोई भी प्रावधान पड़ोसी राज्यों के जल अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है।
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    मैं यह भी संज्ञान में लाना चाहता हूं कि विद्युत उत्पादन पर जल उपकर लगाना राज्य के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत है और यह तर्कसंगत है कि राज्य में बी.बी.एम.बी की तीन परियोजनाओं के जलाशयों से प्रदेश की लगभग 45000 हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो गई है। हिमाचल प्रदेश में इन परियोजनाओं से बने जलाशयों से प्रदेश को पानी पर तो कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं है अपितु इन जलाशयों के विपरित पर्यावरण प्रभाव हिमाचल दशकों से झेल रहा है, वो चाहे क्षेत्रीय जलवायु परिवर्तन (Local Climate Change) हो, कृषि और बागवानी में विपरीत परिवर्तन हो, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से सामना हो, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन हो, इन सभी परिवर्तनों ने इन परियोजनाओं के जलाशयों के आस पास मानवीय जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है।
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    यह विडम्बना है कि आज जल विद्युत परियोजनाएं जब बनती हैं तो इन सभी विपरीत प्रभावों की क्षतिपूर्ति हेतु ESIA (Environmental Social Impact Assessment ) पर्यावरण और सामाजिक प्रभावों का आकलन होता है और इसके लिए ESMP (Environmental Social Management Plan) पर्यावरण, समाजिक प्रबंधन योजना अनुमोदित होकर उस पर अमल होता है और व्यापक रूप से स्थानीय क्षेत्र के उत्थान और पर्यावरण और समाजिक सुरक्षा हेतु कार्य किया जाता है।

     

    उल्लेखनीय है कि बी.बी.एम.बी. की किसी भी परियोजना ने इन सभी मुददों के लिए जरूरी पग नहीं उठाये हैं और स्थानीय आबादी को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। इन जलाशयों ने ना सिर्फ कृषि और बागवानी की भूमि निगली है, यातायात के साधन बाधित किए हैं. पानी के स्त्रोत जलमग्न हुए हैं, धार्मिक स्थल व शमशान घाट डूबे हैं अपितु 50-60 वर्ष पहले उजडे हुए विस्थापितों का पुनर्वासन पूरी तरह नहीं हो पाया है।

     

    पंजाब सरकार का यह कहना कि हिमाचल सरकार का यह कदम गैर कानूनी है तर्कसंगत नहीं है क्योंकि प्रदेश सरकार ने अपने राज्य में स्थापित जल विद्युत परियोजनाओं द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले जल पर उपकर लगाया है न कि पड़ोसी राज्य की सीमाओं में बहने वाले पानी पर। पड़ोसी राज्य में जो Water Cess on Hydro Power Generation Act-2023 का मामला उठाया जा रहा है वह तर्कसंगत नहीं है क्योंकि यह भी बताना उचित होगा कि हिमाचल प्रदेश देश का पहला राज्य नहीं है जिसने परियोजनाओं के उपयोग में आने वाले जल पर उपकर लगाया है।

     

    इससे पहले पड़ोसी राज्य उत्तराखंड ने 2013 में व जम्मू और कश्मीर ने 2010 में Water Cess Act पारित किया गया है। यह कहना भी उचित होगा कि पहाड़ी राज्यों के पास आय की सीमित साधन होने की स्थिति में राज्य को अपने आय के स्त्रोतो को बढ़ाने का पूरा अधिकार है। इस तर्ज पर अन्य पड़ोसी राज्यों जैसे कि उत्तराखंड व जम्मू और कश्मीर ने पहले ही Water Cess Act लागू कर दिया है। जिनसे राज्य को आय प्राप्त हो रही है अतः यह कहना गलत है कि राज्य को अपने जल स्त्रोतो पर Water Cess लगाने का अधिकर नहीं है।

     

    संवैधानिक प्रावधान के अनुसार, पानी राज्य का विषय है और इसके जल संसाधनों पर राज्य का अधिकार है। इसके अलावा, हिमाचल प्रदेश सिंधु जल संधि, 1960 को मान्यता देता है और हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा प्रख्यापित जल विद्युत उत्पादन अधिनियम, 2023 पर हिमाचल प्रदेश जल उपकर उक्त संधि के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन नहीं करता है। क्योंकि जल उपकर लगाने से न तो पड़ोसी राज्यों को पानी छोड़े जान पर कोई प्रभाव पड़ता है और न ही नदियों के प्रवाह पैटर्न में कोई परिवर्तन होता है। इसलिए यह अध्यादेश पंजाब राज्य के किसी भी तटीय अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता है।

     

    इसके अलावा, यह प्रस्तुत करना उचित है कि जल विद्युत उत्पादन अधिनियम, 2023 पर हिमाचल प्रदेश जल उपकर का कोई भी प्रावधान अंतर्राज्यीय नदी विवाद अधिनियम, 1956 के नखिलाफ हैं या उल्लंघन करता है और राज्य को बिजली उत्पादन पर जल उपकर लगाने से रोकता नहीं है। पानी के उपयोग पर और इस अधिनियम की धारा 7 के तहत जल उपकर लगाने पर कोई रोक नहीं है अंतर्राज्यीय नदी विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 7 यह प्रावधान करती है।

     

    जहां तक भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) का संबंध है, इसकी स्थापना विद्युत मंत्रालय द्वारा पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के प्रावधानों के अनुसार भाखड़ा नांगल परियोजना के प्रशासन, रखरखाव और संचालन के लिए की गई थी, जो संयुक्त है। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और चंडीगढ़ राज्यों का उपक्रम है, इसलिए बीबीएमबी के प्रबंधन पर पंजाब व हरियाण राज्यों का ही नियंत्रण नहीं है। इसलिए, बीबीएमबी की परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा लगाए गए जल उपकर का भार हिमाचल प्रदेश सहित पांच राज्यों में समान रूप से वितरित किया जाएगा।

     

    उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर सरकार जैसी विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा जल उपकर पहले ही लगाया जा चुका है। इसी तर्ज पर हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य का राजस्व बढ़ाने के लिए विभिन्न बिजली उत्पादन एजेंसियों द्वारा पानी के उपयोग पर जल उपकर लगाया है। राज्य को पानी के उपयोग पर उपकर लगाने का पूरा अधिकार है क्योंकि पानी राज्य का विषय है।

     

    मैं माननीय सदन को सूचित करना चाहता हूं कि यह अध्यादेश किसी भी तरह से Inter State River Dispute Act-1956 या अन्य किसी MoU के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करता है और मैं समस्त पड़ोसी राज्यों अधिनियम को आश्वस्त करना चाहता हूं कि यह अध्यादेश किसी के भी Legitimate Right को प्रभावित नहीं करेगा।

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